Tuesday, June 5, 2012

है अंधकार के बीच में खोया हुआ एक प्राण विचलित,
दुर्दशा से, मूर्छित, भ्रमित,  मरा हुआ सा  भाव सिमित,
क्या चाहिए उसे, कुछ नहीं एक सूर्य चमक, एक भाग्य प्रति ,
एक चन्द्र शीलता, एक द्वार पथ, एक उद्योग प्रण, एक श्रम  निधि ||

मरण मरण  जीव व्याकुल, जीवन सी यह सचाई है,
तार तार सा जीवन वर्णन, इसमें क्या रिझाई है,
बढ़ के आगे कर ले कुछ,  रख ले यह  जीवन  कृति
एक  चन्द्र शीलता , एक द्वार पथ, एक उद्योग प्रण, एक श्रम  निधि ||

तू तो एक मनुष्य है यहाँ तारे तक  ओझल  हो जाते है,
आकाल विकराल  सभी या अनंत से मिल जाते है,
छोड़ते है चमकती रातें फिर भी वो तेरे लिए, थाम  ले और चला चल, खुद बना तू एक विधि,
एक चन्द्र शीलता, एक द्वार पथ, एक उद्योग प्रण, एक श्रम निधि !!

Friday, April 6, 2012

यादें तो फिर बन जाती है - विवेक रंजन

आज के रोमांच को जीवन का नाम दे,
तनिक से इतहास को मंजिल का प्रमाण दे,
स्वप्न है यह तो जीवन से गुजरते हुए
यादें तो फिर बन जाती है !!

सागर से तरेते हुए तैराक को जिस तरह,
तेज , अविचलित, उत्साहित लड़ाक को जिस तरह,
उपेक्षाना चाहिए दूसरों के प्राधान्य की,
उसी तरह चला चल, विरक्ति को थामे,
यादें तो फिर बन जाती है !!

प्रतिक्रियाये ह्रदय को उत्तर नहीं देती,
अनभिज्ञता मरहम नहीं होती,
नादान हैं, उन्हें छोड़ दे उनके परियों की कहानियों के साथ,
यादें तो फिर बन जाती है !!

ऐसा नहीं स्नेह में त्याग नहीं होता,
ऐसा नहीं प्रणय में अचेतन मन न्याय विरुद्ध, परन्तु न्यायोचित नहीं होता,
फिर भी यह तेरा प्राधिकार, तेरी वरीयता है कोई अनंत श्रीतिज नहीं,
सहेज, संभल जीवन सुन्दर, यादें तो फिर बन जाती है !!